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Sunday, 13 February 2022

जाड़े की रातें, किस्मत की बातें


 जाड़ों की सर्द रातें 

कॉफी के मग 

फायर प्लेस की लपटें 

महंगे कंबलों की गर्माइश 

कल के भविष्य की चिंता में 

नींद की तरसती आँखों 

का ख्वाब 

काश एक नींद का 

टुकड़ा मिल जाता 

एक सर्द रात में 

जीवन के दो बिखरे हुए हालात 

पटरी पर सोती 

पतले कम्बलों में 

ठिठुरती ज़िन्दगी 

बिछावन की जगह आज का अखबार 

जिसकी हैडलाइन है,

"आज वर्ष का सबसे ठंडा दिन है"

आधे फटे कम्बल में 

चिपटा हुआ 

गली का आवारा कुत्ता 

ठंडी और राख हो चुकी 

खोखे वाली लकड़ी की आग 

दिन भर की मज़दूरी के बीच 

नींद बहुत गहरी है 

आज में जीता 

आज पेट भरा है 

कल मेरा वजूद 

ज़िंदा है या मरा 

किसी को शायद 

फर्क नहीं पड़ेगा 

पर नींद के ख्यालों में 

एक ख्वाब है कहीं 

काश एक और

कम्बल का टुकड़ा मिल जाता 

ये जाड़े की रातें 

बड़ी अजीब हैं ये 

किस्मत की बातें 



Saturday, 7 May 2016

चांदनी रातें


वो गर्मी की चांदनी रातें 
बेवजह की बेमतलब की बातें
कितनी ठंडक थी उन रातों में
अब भी समाई है कहीं यादों में 
वो बिछौने और उन पर डले गुलाबी चादर 
अपने अपने हिस्से  के तारों को 
गिनने की आदत 
वो सारे दोस्तों का छत पर 
हुजूम लगाना
देर तक जाग कर 
बातों में मशरूफ हो जाना 
वो वक़्त था या
मुट्ठी की रेत
अब दिलों की तपिश में 
वो ठंडक घुल गयी है
वो चादरें महताब 
अब बंट गया है 
अपने अपने हिस्से के तारों में 
वो याराना बातें 
अब सलीकों में ढल गयी है 
अब अरसे से बंद पड़े
छत पर जाने वाले दरवाजे में
दीमक पड़ गयी है औपचारिकता की
अब कभी नज़र उठा के
आसमान की ओर देखती भी हूँ
तो वह मुझे पागल की उपमा देकर 
मुस्कुरा देती है