Thursday, 28 January 2016

मेरी ज़िम्मेदारी


वो माँ का झूठ मूठ में पतीला खनकाना 
सब भरपेट खाओ बहुत है खाना 
फटी हुइ साड़ी को शाल से ढक लिया 
मेरी फीस का सारा जिम्मा अपने सिर कर लिया 
रात में ठंड से काँपती रहे
और मुझे दो-दो दुशालें से ढांपती रहे 
मैं बरस दर बरस बढ़ता गया 
मेरी भावनाओं, ख़यालातों का दायरा घटता गया 
मैंने तुझसे दूर जा कर 
सिक्कों का महल बनाया 
वक्त को मोहरा बना कर 
तरक्की के सारे दरवाज़ों को खोलता गया 
पर तेरी ओर जाने वाले दरवाजे को खोलना ही भूल गया 
दूर रहकर भी तू पूछती 
तेरी आवाज़ कुछ सर्द है
क्या जीवन में कुछ कमी या कोइ दर्द है 
माँ तेरी बीमारी, लाचारी 
डाक्टर और दवा का इतंज़ार 
धंसती आँखें बंया कर रही थी
जर-जर होते शरीर की कहानी बार-बार 
पिता का काँपते हाथों से 
पुरानी दराज़ में पैसे टटोलना 
अनुभवी आँखों का सही अंदाज़ा
पर कुछ ना बोलना 
बेबसी और लड़खड़ाते कदम
आखिरी सांस और
अनंत आशिर्वाद और प्यार का संगम
ईश्वर मेरे बेटे को हमेशा ख़ुश रख़ना
उसके हिस्से के दुख़ दर्द मेरे सिर करना 
माँ तुझे मेरे प्यार और सहारे की चाहत
जाने क्यों नहीं दी मैंने उन्हें राहत

37 comments:

  1. अति सुन्दर रचना।

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    1. बहुत बहुत आभार आपका राजेश कुमार जी ।

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  2. अति सुन्दर रचना।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका राजेश कुमार जी ।

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  3. हर हाल में अपने बच्चों के बेहतरी के लिए ताउम्र लगी रहना, उनके लिए दुआ करते रहना एक माँ ही कर सकती हैं तभी तो उसे माँ नाम दिया है ....
    मर्मस्पर्शी रचना ..

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका कविता जी ।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-01-2016) को "प्रेम-प्रीत का हो संसार" (चर्चा अंक-2237) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत आभार आपका शास्त्री सर जी । मेरी रचना को चर्चा अंक में स्थान देने का ।

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  5. मधुलिका जी, मॉ के उपकार इंसान किसी भी सुरत में चुका नहीं सकता। बहुत सुंदर रचना।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका ज्योति जी ।

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  6. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति। बहुत मर्मस्पर्शी

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    1. बहुत बहुत आभार आपका कैलाश शर्मा जी ।

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  7. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति। बहुत मर्मस्पर्शी

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका कैलाश शर्मा जी ।

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  8. बहुत सुंदर और भावात्मक रचना.

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका राजीव कुमार जी ।

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  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " बीटिंग द रिट्रीट 2016 - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. मेरी रचना को ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने का शुक्रिया ।

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  11. बहुत ही सुन्दर रचना ।
    आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
    ब्लॉग"दीप"

    यहाँ भी पधारें-
    तेजाब हमले के पीड़िता की व्यथा-
    "कैसा तेरा प्यार था"

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका.

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  12. बहुत ही सुन्दर रचना ।
    आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
    ब्लॉग"दीप"

    यहाँ भी पधारें-
    तेजाब हमले के पीड़िता की व्यथा-
    "कैसा तेरा प्यार था"

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका प्रदीप कुमार जी. मेरी रचना को ब्लाग दीप में स्थान देने पर.

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  13. मर्मस्पर्शी ....

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका अम्रिता जी

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  14. बेहतरीन और भावपूर्ण रचना......बहुत बहुत बधाई.....

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आप का प्रसन्बदन चतुर्बेदी जी ।

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  15. ममत्व की कोई उपमा नहीं ।
    बहुत सुंदर कविता ।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका महेंद्र वर्मा जी ।

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  16. माँ से जो न सोच सको वो भी उम्मीद चुटकी में मिल जाती है ... शायद ताभी तो माँ सा कोई नहीं ... दिल को छूते हुए शब्द ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका दिगम्बर सर जी मेरी रचना को पढने और सराहने का ।

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  17. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।

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  18. सुन्दर और भावपूर्ण कविता।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।

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  19. सुंदर भावाभिव्यक्ति

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका हिमकर श्याम जी ।

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