आज बारिश बरसते हुए
मेरे साथ मुस्कुराई
उसने कहा, आज मैं
आँखों के पानी की तरह
नहीं बरसूँगी
मुस्कुराहट के मोतियों सी
बिखरुंगी
कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी
खिड़की के शीशे पर
देर तक ठहरूंगी
तुम वही बैठ कर
कुछ लिखना
मैं तुम्हारी स्याही को
नहीं फैलाउंगी
पर आज तुम मुस्कुराना
आज मैं तुम्हारे शहर से
दूर नहीं जाउंगी
तुम कॉफ़ी का मग
खिड़की पर ही रखना
भाप और ओस से
धुंधले हुए शीशे पर
अपनी अँगुलियों से
उन गुज़री हुई
तारीखों को लिखना
कब तुम्हारी मुस्कुराहट
खिलखिलाहट में बदल गई
और कब डायरी
इंतज़ार शुरू और खत्म
होने की तारीखों
दिनों महीनों सालों की कहानी
उन उजले सफों पर
स्याही में तब्दील हो गई ...
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 17 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteआदरणीय सर तहेदिल से शुक्रिया आपका मेरी रचना को पाँच लिंकों के आंनद में स्थान देने पर
DeleteBeautiful 😍
ReplyDeleteतहेदिल से शुक्रिया आपका
Deleteअरसे बाद लिखा आपने मधूलिका जी और क्या ख़ूब लिखा! मन सरस हो गया पढ़कर। बस यूँ ही लिखती रहिए।
ReplyDeleteतहेदिल से शुक्रिया आपका आदरणीय
Deleteबहुत कोमल भावों से बुनी सुंदर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीया
Deleteमुस्कुराहट के मोतियों सी बिखरुंगी
ReplyDeleteआँखों के पानी की तरह नहीं बरसूँगी
कुछ लिखना , तुम्हारी स्याही नहीं फैलाउंगी …..
सरस सुंदर रचना
तहेदिल से शुक्रिया आपका आदरणीय
Deleteबहुत सुन्दर, सरस अभिव्यक्ति
ReplyDeleteतहेदिल से शुक्रिया आपका आदरणीया
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteतहेदिल से शुक्रिया आपका
Deleteबहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय
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