Saturday, 11 June 2016

चाँद का पैगाम


कल जब परदेस में
तनहा बैठा था मैं 
मेरे देश के चाँद ने हौले से कहा 
वापस आजा ओ परदेसी 
तेरे देश में भी मैं चमक रहा 
उन सिक्को की आबोताब में 
मत खो जा 
तेरे अपने बड़े बेसब्री से 
राह तक रहे हैं 
जा उनका रुखसार चमका 
बेजान कागजों के ढेर 
अपने रिश्तों को
पाने में कर देगा देर 
माँ का आखिरी सांस तक इंतज़ार 
नहीं दोबारा कर पाएगा 
पिता से आँखें चार 
जिसे छोड़ गया था सावन में 
वो मौसम सिमट गया है 
उन दो आँखों के आँगन में 
बिन बादल बरस जाती है 
भिगो जाती है सुर्ख दामन 
कोई तेरा अपना 
तुझसे सवाल कर रहा 
कुछ तो बता जा 
कब तू इधर का रुख कर रहा 
तेरी पेशवाई के लिए 
वो ढेरों ख्वाब बुन रही  
फिज़ाओं में घुल जाने दे 
तेरी हसी जिसने औरों को खामोश कर रखा 

41 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (13-06-2016) को "वक्त आगे निकल गया" (चर्चा अंक-2372) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर आपका ।

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया सर आपका ।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " वकील साहब की चतुराई - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बहुत बहुत आभार आपका ।

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    2. बहुत बहुत आभार आपका ।

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  3. वाह - बहुत खूब

    http://hradaypushp.blogspot.in/2013/03/maa.html

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका राकेश जी ।

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  4. बहुत बढ़िया ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका प्रतिभा जी ।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आशा जी ।

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आशा जी ।

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  6. बहुत संवेदनशील भाव ... परदेस में रहते हुए भी यही एहसास रहता है की काश देश में होते ... पर कई बार अर्थ की मजबूरी कठोर हकीकत के आगे बेबस होता है इंसान ....

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  7. बहुत बहुत आभार आपका नेस्वा सर जी मेरी ब्लाग पर आने का और मेरी रचना को सराहने का ।

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  8. दिल को छूते बहुत गहन अहसास...बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

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    1. बहुत बहुत आभार आपका कैलाश शर्मा जी ।मेरी ब्लाग पर आने का ।

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    2. बहुत बहुत आभार आपका कैलाश शर्मा जी ।मेरी ब्लाग पर आने का ।

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  9. विदेशों में काम कर रहे लोोगों को अपने वतन की बहुत याद आती है। जो सुकून अपने देश में मिलता है वह दुनिया और कहीं नहीं मिल सकता। आपकी यह रचना उस दर्द को बखूबी बयां कर रही है।

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    1. बहुत बहुत आभार आपका जमशेद आजमी जी ।

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    2. बहुत बहुत आभार आपका जमशेद आजमी जी ।

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  10. खूबसूरत भावों से सजी सुन्दर कविता। अति सुन्दर।

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  11. खूबसूरत भावों से सजी सुन्दर कविता। अति सुन्दर।

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  12. बहुत खूब. भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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    1. बहुत बहुत आभार आपका हिमकर जी ।

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  13. मधुलिका जी, बहुत ही भावपुर्ण अभिव्यक्ति है ये। चंद सिक्कों के लिए लोग विदेश तो जाते है लेकिन उनके अपने यहां पर उनके लिए तरसते रहते है।

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    1. बहुत बहुत आभार आपका ज्योति जी ।

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  14. कुछ लोगों की रोजी रोटी के लिए एक तरह की मज़बूरी रहती है परदेश में रहने की, लेकिन कुछ की इससे अच्छा कुछ ज्यादा पाने की लालसा, अच्छे ठाट बाट से रहने की उत्कंठा, कुछ भी हो लेकिन जो ख़ुशी अपने वतन की खुली हवा में मिलती हैं वह कहीं नहीं मिलती .. यह और बात है की यह बात बहुत देर से समझ आती हैं ...

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    1. बहुत बहुत आभार आपका कविता जी ।

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  16. अपना चाँद, हमें आवाज़ देता है, पुकारता है .............हृदयस्पर्शी कविता ।

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  17. बहुत बहुत आभार आपका महेन्द्र वर्मा जी ।

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  18. अरे यह क्‍या दीदी, आपका ब्‍लाग 11 जून से अपडेट नहीं है। कोई नई पोस्‍ट नहीं। आपका स्‍वास्‍थ्‍य तो ठीक है।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका जमशेद आज़मी जी । कोशिश करुँगी जल्द ही नई पोस्ट लिखने की ।

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  19. अरे यह क्‍या दीदी, आपका ब्‍लाग 11 जून से अपडेट नहीं है। कोई नई पोस्‍ट नहीं। आपका स्‍वास्‍थ्‍य तो ठीक है।

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    1. आपने जो अहमियत दी उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया ।

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  20. Bahut hi accha vichar sabdo ke madhyam SE.

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  21. Bahut hi accha vichar sabdo ke madhyam SE.

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    1. बहुत बहुत आभार आपका राजेश मिश्रा जी ।

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  22. Hridaysparshi rachana hai Madhulika ji ..Bahut sundar....

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका पल्लवीजी

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