पता नही क्यों ?
तू आती है मिल्ती है और
प्यार भी बहुत करती है
तुझे मेरी फिक्र भी है
पर मुझे तेरा इतंज़ार है
कल कोइ मुझसे पूछ रहा था
अरे पागल कैसा तेरा ये इतंज़ार है
मैं तुम्हें नहीं बता सकती
बात बरसों पुरानी है
वो मेरा नन्हा सा मन
सालों बाद भी; मेरे अंदर
छुप कर बैठा है
और सवाल करता है
अपने आप से बार-बार
वो सवाल आँखों में
छुप गया है आँसू बना
होठों पर आते-आते रुक गया है
कुछ मन में फाँस बन चुभ गया है
तूने मुझे अपने से अलग कर कहा था
मैं यहाँ खुश रहूंगी
और तू मुझसे मिलने
आया करेगी कभी-कभी
वो कभी-कभी शब्द
मेरे मन से कभी नहीं निकला
वो तेरा कहना आया करूँगी
मेरे लिए इतंज़ार शब्द बन गया
और वो बचपन का इतंज़ार
मेरे अदंर डर बना कर ऐसे छुप गया कि
वो कभी ख़ुली हवा में निकला ही नहीं
और वो इंतज़ार शब्द
अपाहिज हो गया
अब वो चल नहीं सकता है
इसलिए मेरे अंदर से निकल नहीं पाता है ।
चित्र गूगल के माध्यम से