Sunday, 30 August 2026

तेरी यादों का अल्ज़ाइमर



 वो मुलाक़ात का सफ़र 
बहुत ख़ास कुछ भी नहीं 
अपने पर अपनी ही ज़फ़र 
उन यादों को बक्से में समेट कर 
हज़ारों मील दूर चले जाना 
एक एक यादों को रोपना 
बीज और नन्हे पौधे से 
बरगद तक का सफ़र 
कभी अपने में खोकर 
सारी यादों की चादर 
समेट कर ओढ़ना 
कभी ज़िम्मेदारियों में 
खोकर सारी यादों 
को भूल जाना 
अपने वजूद को भूल जाना 
ये यादों का आना और जाना 
मेरे वैद्य ने तो इसे 
अल्ज़ाइमर का नाम दे डाला 
हाँ शायद सच ही है 
तेरी यादों का अल्ज़ाइमर ।

2 comments:

  1. आपकी रचना स्मृति,वेदना,समय के प्रवाह और आत्म-बोध का बेहद गहरा और भावपूर्ण मनोवैज्ञानिक दस्तावेज़ है।
    सादर।
    --------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    ReplyDelete
  2. आपके वैद्य ने बढ़िया नाम दिया -सुकून मिलें यादे नहीं हों तो-

    ReplyDelete