Sunday, 30 August 2026
तेरी यादों का अल्ज़ाइमर
Tuesday, 26 May 2026
बचपन हॉस्टल घर
वो ख़ामोशी बचपन में
हॉस्टल की
मेरे अंदर धीरे धीरे
घर करने लगी थी
शब्द जुबां पर कम
ज़ेहन में ज़्यादा
जमा होने लगे थे
कलम कागज़ की
किल्लतें हो चली थी
स्याही की दवातों के
अम्बार भरभराने लगे थे
कमरा टेबल और मैं
शब्दों से भरे
कागज़ों का ढेर
बचपन के साथ साथ
बढ़ते गए भावनाओं के चिनार
चन्द दिनों भीड़ में
गुज़ारने के बाद
वापस खामोशी की ओर
रुख करना
भीड़ में रूबरू हो ही नहीं पाते
की रुखसती का वक़्त आ जाता
इस आने जाने के
मुसाफिर बनने के बीच
मन करता
यहीं कहीं बड़ा सा
बरगद का पेड़ बन जाऊँ
ढेर सारे परिंदे जमा हो
और उनको मैं अपने
जज़्बातों को सुनाऊँ...
Wednesday, 15 April 2026
जब बारिश मुस्कुराई
आज बारिश बरसते हुए
मेरे साथ मुस्कुराई
उसने कहा, आज मैं
आँखों के पानी की तरह
नहीं बरसूँगी
मुस्कुराहट के मोतियों सी
बिखरुंगी
कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी
खिड़की के शीशे पर
देर तक ठहरूंगी
तुम वही बैठ कर
कुछ लिखना
मैं तुम्हारी स्याही को
नहीं फैलाउंगी
पर आज तुम मुस्कुराना
आज मैं तुम्हारे शहर से
दूर नहीं जाउंगी
तुम कॉफ़ी का मग
खिड़की पर ही रखना
भाप और ओस से
धुंधले हुए शीशे पर
अपनी अँगुलियों से
उन गुज़री हुई
तारीखों को लिखना
कब तुम्हारी मुस्कुराहट
खिलखिलाहट में बदल गई
और कब डायरी
इंतज़ार शुरू और खत्म
होने की तारीखों
दिनों महीनों सालों की कहानी
उन उजले सफों पर
स्याही में तब्दील हो गई ...

