Tuesday, 6 June 2017

मेरे शहर में तू क्या आया


बाद मुद्दत के मेरे शहर में 
तू क्या आया
हवा का झोंका
तेरे आने का 
संदेसा लाया 
यादों में वो तेरा 
चेहरा उभर आया 
लबों ने हौले से 
पुराने नगमों को 
गुनगुनाया 
आँखों में आंसू जो
मोती बनके थे अटके 
आज न चाह के भी
कहीं वो न जाएँ छलकें 
जो इंतज़ार था तेरे लिए 
वो आज भी बरक़रार है 
तेरा सफ़र तुझे ले गया 
अपने ठिकाने
मेरे शहर की गलियाँ
सूनी रह गई
बाद जाने के लिए 
वो अब ढूंढ रही थीं 
तेरे आने के बहाने 
बाद मुद्दत के मेरे शहर में 
तू क्या आया |

6 comments:

  1. बहुत खूब ... किसी का इंतज़ार हो और फिर वो आ जाये ...
    ऐसे में एकसास को बयान करना आसान नहीं ... पर बाखूबी उतारा है शब्दों में इन एहसासों को ...

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    1. तहेदिल से शुक्रिया नेस्वा सर मेरी ब्लॉग पर आने का ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (08-06-2017) को
    "सच के साथ परेशानी है" (चर्चा अंक-2642)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. तहेदिल से शुक्रिया शास्त्री जी मेरी ब्लॉग को चर्चा मंच मे शामिल करने पर ।

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  3. जो दिल में रहते हैं वो दूर रहकर भी पास रहते हैं लेकिन जब आँखों के सामने वो आ जाते हैं तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता
    बहुत सुन्दर दिल से निकली एक आवाज

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आप का कविता जी ।

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